शुक्रवार, 25 नवम्बर 2011

ग़ज़ल

लोग वहम-ओ-गुमान रखते हैं 
अपने हक में बयान रखते हैं 


मुल्क आखिर यकीन किस पे करे 
सब हथेली पे जान रखते हैं 


मालिक-ए-दो जहाँ समझता है 
जो ज़बां बेज़बान रखते हैं 


अब गले मिलते हैं कहाँ इंसान 
फासला दरमियान रखते हैं 


आप सच बोलने का अज्म करें 
किस्सा गो दास्तान रखते हैं 


पाँव किसके ज़मीं पे हैं 'सर्वत'
सभी ऊंची उड़ान रखते हैं 

16 टिप्पणियाँ:

सर्वत एम० ने कहा…

बहुत दिनों बाद ब्लॉग की सुधि आई है. मालूम नहीं आपको पसंद आए न आए. कमेंट्स की इच्छा बिलकुल भी नहीं है, सिर्फ हाजिरी लगाई है...:)

इस्मत ज़ैदी ने कहा…

मालिक-ए-दो जहाँ समझता है
जो ज़बां बेज़बान रखते हैं

BAHUT KHOOB !!
AAP KI AAMAD APNE USEE SHADD O MAD USEE AAB O TAAB KE SAATH HUI HAI
MUBARAK HO !!

अर्चना तिवारी ने कहा…

मैंने दो बार टिप्पणी दी...पता नहीं कहाँ गायब हो गई

अर्चना तिवारी ने कहा…

गुरु जी क्या गज़ब कहा है....

"लोग वहम-ओ-गुमान रखते हैं
अपने हक में बयान रखते हैं"

आप पिछले जन्म में ज़रूर गोताखोर रहे होंगे तभी तो ऐसे ऐसे मोतियों जैसे शे'र जेहन के सागर से खोज लाते हैं जिसका कोई जोड़ नहीं....

kshama ने कहा…

अब गले मिलते हैं कहाँ इंसान
फासला दरमियान रखते हैं
Pooree gazal behtareen hai,par ye panktiyan khaas achhee lageen!

सुलभ ने कहा…

लोग वहम-ओ-गुमान रखते हैं
अपने हक में बयान रखते हैं

ये शेर तो सीधे भेद कर निकल गया.
उस्तादों का तजुर्बा क्या होता है
शेर दर शेर निकल आता है.


मालिक-ए-दो जहाँ समझता है
जो ज़बां बेज़बान रखते हैं
बहुत खूब.

Amit Singh ने कहा…

"अब गले मिलते हैं कहाँ इंसान
फासला दरमियान रखते हैं "
वाह वाह क्या सच्चा शेर है

VIJAY KUMAR VERMA ने कहा…

नववर्ष की बहुत बहुत हार्दिक शुभकामनाएँ

shashi ने कहा…

bahut khoob

shashi ने कहा…

पाँव किसके ज़मीं पे हैं 'सर्वत'
सभी ऊंची उड़ान रखते हैं
sabhi ki bajaaye sab hi agar kahen to shaayad jyaada achha lage, meri raay mein.

Dr. Ahmad Ali Barqi Azmi ने कहा…

AAP KA RANG E TAGHAZZUL HAI NEHAYAT DILNASHEEN

AAP KE ARZ E HUNAR PAR AAFREEN SAD AAFREEN

Dr. Ahmad Ali Barqi Azmi ने कहा…

HAI NEHAYAT KHOOBSOORAT NAAM SARWATINDIA

SAB KA MANZOOR E NAZAR HO AAP KA DILKASH BLOG

आशा जोगळेकर ने कहा…

मालिक-ए-दो जहाँ समझता है
जो ज़बां बेज़बान रखते हैं


अब गले मिलते हैं कहाँ इंसान
फासला दरमियान रखते हैं

वाह सर्वत साहब बेहद खूबसूरत और असरदार ।

आशा जोगळेकर ने कहा…

मालिक-ए-दो जहाँ समझता है
जो ज़बां बेज़बान रखते हैं


अब गले मिलते हैं कहाँ इंसान
फासला दरमियान रखते हैं


बहुत सुंदर सर्वत साहब खूबसूरत गज़ल ।

SIRAJ FAISAL KHAN ने कहा…

Wah Ustaad ab kya kahu mai...bus mehsus kar sakta hu...baar baar padh raha hu shayad thoda sa asar mil jaye aapka...sabhi ashaar bahut Zabardast hain..Zindabaad

आशा जोगळेकर ने कहा…

अगली रचना के इंतज़ार में ।