शुक्रवार, 2 अप्रैल 2010

गज़ल-एक बार फिर

कितने दिन, चार, आठ, दस, फिर बस
रास अगर आ गया कफस, फिर बस


जम के बरसात कैसे होती है
हद से बाहर गयी उमस फिर बस


तेज़ आंधी का घर है रेगिस्तान
अपने खेमे की डोर कस, फिर बस


हादसे, वाक़यात, चर्चाएँ
लोग होते हैं टस से मस, फिर बस


सब के हालात पर सजावट थी
तुम ने रक्खा ही जस का तस, फिर बस


थी गुलामों की आरजू, तामीर
लेकिन आक़ा का हुक्म बस, फिर बस


सौ अरब काम हों तो दस निकलें                          
उम्र कितनी है, सौ बरस, फिर बस

32 टिप्‍पणियां:

Suman ने कहा…

nice

विनोद कुमार पांडेय ने कहा…

सर्वत जी कमाल की रचना...ग़ज़ल केवल शब्द और भाव से ही नही संपन्न है बल्कि लय से भी दिल जीत लेता है..
बेहद उम्दा ग़ज़ल..पढ़ कर ही लग जाता है ऐसी ग़ज़ल की रचना किसी साधारण रचनाकार से संभव ही नही....

एक लाइन मेरे ओर से स्वीकार करें..

ग़ज़ल की बारीक़ियाँ कोई आप से सीखे,
कलम उठाए,बैठे,लिखे,फिर बस,

सर्वत जी दिल से प्रणाम स्वीकारें...

इस्मत ज़ैदी ने कहा…

थी गुलामों की आरजू, तामीर
लेकिन आक़ा का हुक्म बस, फिर बस

बहुत ख़ूब ,हालात की बेह्तरीन अक्कासी

Udan Tashtari ने कहा…

भाई जी, छा गये!! बस्स!!

सुलभ § सतरंगी ने कहा…

एक बेहतरीन कश लगाया आपने.

वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा…

तेज़ आंधी का घर है रेगिस्तान
अपने खेमे की डोर कस, फिर बस
बहुत खूब. लम्बे अन्तराल के बाद खूबसूरत गज़ल के साथ आपकी वापसी का स्वागत है.

veerubhai ने कहा…

"unse milne ki jo tamannaa thi ,
muhabbat ke khanhar ko dekhaa ,aur bas ."
veerubhai1947.blogspot.com
mar-havaa ,kyaa khoob kahi hai "gazal "

Shekhar kumawat ने कहा…

AB KARO NA BAS


wow achi rachan he
aap ko badhai



shekhar kumawat


http://kavyawani.blogspot.com/

राज भाटिय़ा ने कहा…

थी गुलामों की आरजू, तामीर
लेकिन आक़ा का हुक्म बस, फिर बस
जनाब क्य बात है, बहुत सुंदर जी.
धन्यवाद

वन्दना ने कहा…

bahut sundar bahvon se saheji huyi gazal.

हिमान्शु मोहन ने कहा…

बेहतरीन ग़ज़ल, बह्र अच्छी, अदायगी अच्छी और काफ़िए का चुनाव माशा-अल्लाह!
ज़मीन-ए-ग़ज़ल : सुब्हान-अल्लाह!
जारी रहिए, इंशा-अल्लाह!

वीनस केशरी ने कहा…

आप आये बहार आई :)

अब तो नियमित रहेंगे ना :)

मुझे ये शेर पसंद आया

जम के बरसात कैसे होती है
हद से बाहर गयी उमस फिर बस

अर्कजेश ने कहा…

क्‍या बात है ! क्‍या बात है !
और कुछ नहीं कहना , इस‍के सिवाय कि जिसको कहते हैं कि मजा आ गया

हादसे, वाक़यात, चर्चाएँ
लोग होते हैं टस से मस, फिर बस

जम के बरसात कैसे होती है
हद से बाहर गयी उमस फिर बस


क्‍या जमाया है । वाह !

M VERMA ने कहा…

हादसे, वाक़यात, चर्चाएँ
लोग होते हैं टस से मस, फिर बस
क्या मर्म को छुआ है आपने
बेहतरीन

दिगम्बर नासवा ने कहा…

सौ अरब काम हों तो दस निकलें
उम्र कितनी है, सौ बरस, फिर बस ..

सर्वत साहब .. आप जेसे ग़ज़ल कार ही ऐसी बेहतरीन ग़ज़लें कह सकता है ... ये काफिया रदीफ़ सब के बस की बात नही ... इतनी गहरी बातों को बस एक शेर में बाँधना भी आसान नही पर ये फन आपमे मौजूद है ...

गौतम राजरिशी ने कहा…

उफ़्फ़्फ़...ग़ज़ल की इस अद्‍भुत नायाब और एक दम दुर्लभ जमीन पर तो हम लोट-लोट हुये जा रहे हैं। नमन है गुरूवर इस अनूठी जमीन के लिये। रदीफ़ की बस और काफ़िये तो बस बस...

इस रदीफ़ को निभाना आपका ही सामर्थ्य है।

अपूर्व ने कहा…

जबर्दस्त ग़ज़ल सर जी..नये-नये शेर..और जुदा अंदाज..खासकर रदीफ़ तो फिर बस एकदम्मे कम्माल ही है!
हैट्स ऑफ़!

singhsdm ने कहा…

हादसे, वाक़यात, चर्चाएँ
लोग होते हैं टस से मस, फिर बस
वाह जी वाह क्या मुकम्मल फ़रमाया..........रदीफ़-काफिया सब कुछ अद्भुत !.........शरवत साहब हम तो फैन हैं आपके इस जादूगरी के.......! मुक़र्रर

Apanatva ने कहा…

bahut khoob.......

शाहिद मिर्ज़ा ''शाहिद'' ने कहा…

जम के बरसात कैसे होती है
हद से बाहर गयी उमस, फिर बस
.......
खूबसूरत कमाल है फ़न का
वाह निकला ज़बां से बस, फिर बस

आमीन ने कहा…

samjhane ke liye kai baar padhna pada. ek do shabad ab bhi samajh nhi aaye hain... jaise kafas, taamir

संजय भास्कर ने कहा…

बहुत ही सुन्‍दर प्रस्‍तुति ।

"अर्श" ने कहा…

अभी तक ठिठका हुआ हूँ इस ग़ज़ल को पढ़ के , जिस बह'र-ओ-वजन पे आपने यह ग़ज़ल कही है ... आपके ही बूते की बात है ..... बस सलाम करता चलूँ आपको ... इस नायाब खयालात के लिए... यही कहूँगा के पुराने खँडहर की एक ईंट नयी मकानों के बराबर ....


अर्श

भूतनाथ ने कहा…

इस पर कुछ कहूँ अगर
तो वो होगा बे-असर !!
ये हर्फ़ यूँ बहते हैं गोया
सरर सरर सरर सरर !!
सर्वत का इम्तेहाँ न लीजै
वो है हर्फों का इक बसर !!
सूरज को दीया दिखाऊं तौबा
तारीफ कैसे उसकी करूँ मगर !!

sandhyagupta ने कहा…

हादसे, वाक़यात, चर्चाएँ
लोग होते हैं टस से मस, फिर बस

bahut sundar.shubkamnayen.

kshama ने कहा…

Aah! Aapne to gazab hi kar diya!

श्याम सखा 'श्याम' ने कहा…

कमाल कर दिया सर्वत भाई
भाव-काफ़िये और तेरी उड़ान फ़िर बस
श्याम सखा श्याम

MUFLIS ने कहा…

हुज़ूर ...
नहीं जानता कि ऐसी नायाब और
मुरस्सा ग़ज़ल से दूर कैसे रह गया मैं
ऐसी दक़ीक़ ज़मीन
और ऐसा तरहदार लहजा
एक एक लफ्ज़ में
की गयी मशक्क़त झलक रही है .....

और ये शेर तो कहन के हिसाब से
बिलकुल जानदार,,,शानदार,,,बेमिसाल....

हादसे, वाक़यात, चर्चाएँ
लोग होते हैं टस से मस, फिर बस

अब सताइश हो भी तो कैसे
बिलकुल बेलाफ्ज़ हूँ दोस्त !!

RBharol ने कहा…

एकदम हट के. गहरी सोच और बहुत सुंदर.

श्रद्धा जैन ने कहा…

तेज़ आंधी का घर है रेगिस्तान
अपने खेमे की डोर कस, फिर बस

waah waah ...... dor kas...

हादसे, वाक़यात, चर्चाएँ
लोग होते हैं टस से मस, फिर बस

bahut bahut sach

सब के हालात पर सजावट थी
तुम ने रक्खा ही जस का तस, फिर बस

kya baat hai


थी गुलामों की आरजू, तामीर
लेकिन आक़ा का हुक्म बस, फिर बस

bahut khoob


सौ अरब काम हों तो दस निकलें
उम्र कितनी है, सौ बरस, फिर बस
waah kamaal ka sher

bahut achcha laga aapki gazal padh kar
aise kase hue sher padhkar
bahut sakun lagta hai

नीरज गोस्वामी ने कहा…

लफ़्ज़ों से ये कमाल सिर्फ और सिर्फ आपके ही बस की बात है सर्वत साहब...लाजवाब ग़ज़ल...और बस नहीं अभी और और और...चाहिए..
नीरज

शिव कुमार "साहिल" ने कहा…

Kya khubsurti bakshi hein har alfaz ko aapne .... Shukriya Sir.... aapse bahut kuch sikhne ko milta hein har baar.