गुरुवार, 7 मई 2009

गजल- 60

एक ही आसमान सदियों से
चंद ही खानदान सदियों से

धर्म, कानून और तकरीरें
चल रही है दुकान सदियों से

काफिले आज तक पड़ाव में हैं
इतनी लम्बी थकान, सदियों से !

सच, शराफत, लिहाज़, पाबंदी
है न सांसत में जान सदियों से

कोई बोले अगर तो क्या बोले
बंद हैं सारे कान सदियों से

कारनामे नजर नहीं आते
उल्टे सीधे बयान सदियों से

फायदा देखिये न दांतों का
क़ैद में है जबान सदियों से

झूठ, अफवाहें हर तरफ सर्वत
भर रहे हैं उडान सदियों से

7 टिप्‍पणियां:

गर्दूं-गाफिल ने कहा…

ये काम ए कशीदा एक दिन में नहीं होता
कुर्बतएगजल में सर्वत है तमाम सदियों से

हर बार होता हूँ कायल कलामबाज़ी का
निजाम ए सुखन पर है मुकाम सदियों से

बधाइयाँ

Udan Tashtari ने कहा…

बेहतरीन!!

गर्दूं-गाफिल ने कहा…

हमारे गरीब खाने पे आना नही हुआ
हमारे कूंचे से दोस्ताना नहीं हुआ ?

sanjiv gautam ने कहा…

बहुत खूब! लाजवाब.

Mumukshh Ki Rachanain ने कहा…

लाजवाब ग़ज़ल के हर शेर एक से बढ़ कर एक.
"आसमान" से "उडान" के बीच सब कुछ तो लपेट लिया आपने.

सुन्दर प्रस्तुति पर बधाई.

चन्द्र मोहन गुप्त

Shiv Kumar Saini "Sahil" ने कहा…

bude ho rahe the gurbat ke yaranein
or makan sadion se
humnein har maszid har mandir mein jakar dekha
magar jagga na koi khuda koi baghwan sadion se
apna na hi mila in raahon pe, in manjilo pe,
bas takrate rahe anjan sadion se
ho sake to koi, mahkash se pushe gam ka sabab
yun hi nahi he vo badnam sadion se
us manjil ko dekh kar bhi hum shu na sake
habi rahi ko hum par thakhan sadion se
ajj jane sa na roko mujhe, ye ghar mera na tha
akhir hum to the mahman sadion se.

Sir, apki ghazal kafhi achi lagi, every single word has a meaning.

श्याम सखा 'श्याम' ने कहा…

कैद में है जुबान
वाह सर्वत जी..
श्याम