बुधवार, 12 अगस्त 2009

गजल- 66

जब जब टुकड़े फेंके जाते हैं
कुत्ते पूंछ हिलाते जाते हैं

हाथ हिला कर कोई चला गया
लोग खुशी से फूले जाते हैं

चेहरा बदला, तख्त नहीं बदला
चेहरे क्या हैं, आते - जाते हैं

इल्म, शराफत हैं कोसों पीछे
सिर्फ़ मुसाहिब आगे जाते हैं

सत्य, अहिंसा, प्यार, दया, ममता
इस रस्ते बेचारे जाते हैं

जीना है तो यह फन भी सीखो
कैसे तलुवे चाटे जाते हैं

सरकारी विज्ञापन पढ़िये तो !
अब भी कसीदे लिक्खे जाते हैं

झंडा, जश्न, सलामी, कुछ नारे
हम नाटक दुहराते जाते हैं।

20 टिप्‍पणियां:

संजीव गौतम ने कहा…

प्रणाम दादा
साहित्य हिन्दुस्तानी पर गीत और यहां ग़ज़ल पढी. आज के दिन की इससे बेहतर शुरूआत और कुछ नहीं हो सकती. शेर नोट कर लिये हैं आफिस में ए.आर. सर हैं जनाब हसन जफर जलील. शौकिया लेकिन बहुत अच्छे शाइर हैं. अभी कुरआन पर काम कर रहे हैं. मिलते ही कहेंगे शेर सुनाओ संजीव, उन्हें आज यही ग़ज़ल सुनाने वाला हूं.

ओम आर्य ने कहा…

बहुत बहुत ही सुन्दर भाव से भरी पंक्तियाँ......बधाई

Nirbhay Jain ने कहा…

achhi rachna hai

hum likhna kuch chahte hai
aur likh kuch aur jate hai
jeena muskil ho gaya hai lekin
fir hum jite jaate hai

venus kesari ने कहा…

sundar abhivyakti

venus kesari

गर्दूं-गाफिल ने कहा…

ग़ज़ल के ये तेवर ये धार
सुखन का है असली शृंगार
तरेरे भौहं अगर अल्फाज़
नरम पड़ जाती है तलवार
आग में जलता है विश्वास
न गाया जाये राग दरबार
बधाई फिर से लो एक बार
इल्म ए सर्वत को नमस्कार

Mumukshh Ki Rachanain ने कहा…

बेहतरीन ग़ज़ल का एक और नायब तोहफा परोसा है आपने.
हमेशा की तरह हर शेर की धार एक से बढ कर एक.
बधाई! बधाई!! बधाई!!!

रचना गौड़ ’भारती’ ने कहा…

आज़ादी की 62वीं सालगिरह की हार्दिक शुभकामनाएं। इस सुअवसर पर मेरे ब्लोग की प्रथम वर्षगांठ है। आप लोगों के प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष मिले सहयोग एवं प्रोत्साहन के लिए मैं आपकी आभारी हूं। प्रथम वर्षगांठ पर मेरे ब्लोग पर पधार मुझे कृतार्थ करें। शुभ कामनाओं के साथ-
रचना गौड़ ‘भारती’

Mrs. Asha Joglekar ने कहा…

swatantrata diwas kee bahut bahut shubh kamnaen. Aapkee gazlen to kamal kee hai aapk mere blog par aaye. Jarra nawajee ka shukriya.

Harkirat Haqeer ने कहा…

जीना है तो यह फ़न भी सीखो
कैसे तलुए चाटे जाते हैं

वाह ...वाह....बहुत खूब.....!!

झंडा, जश्न, सलामी कुछ नारे
हम नाटक दुहराते जाते हैं

क्या खूब करारी चोट की है आपने ....लाजवाब ......!!

MUFLIS ने कहा…

सत्य,अहिंसा,प्यार,दया,ममता
इस रस्ते बेचारे जाते हैं

एक कटु सत्य को
किस आसानी और सादगी
से प्रस्तुत किया आपने .....
सच मुच सराहनीय है ......
पूरी रचना मननीय बन पडी है
अभिवादन स्वीकारें
---मुफलिस---

दर्पण साह "दर्शन" ने कहा…

ilm sharafat hai koson peeche....

...sir sahi kaha aapne !

aur yakeen maniye har ek sher kabil-e-daad hai.

main to theek se taarif bhi nai kar sakta.

Prem Farrukhabadi ने कहा…

झंडा, जश्न, सलामी कुछ नारे
हम नाटक दुहराते जाते हैं
लाजवाब!!!

अर्शिया अली ने कहा…

धारदार गजल।
( Treasurer-S. T. )

Rakesh Singh - राकेश सिंह ने कहा…

बहुत तेज धार है | धार बनाये रखें, धयन रहे ये कुंद ना होने पाए |

विवेक सिंह ने कहा…

बहुत अच्छा लगा यह गज़ल पढ़कर !

आभार !

Nirmla Kapila ने कहा…

झंडा, जश्न, सलामी कुछ नारे
हम नाटक दुहराते जाते हैं
बिलकुल सही बेहतरीन प्रस्तुति बधाई

हैरान परेशान ने कहा…

आपकी कई रंगों वाली गजल ने तो मुझे हैरान परेशान कर दिया
मुबारक हो

नीरज गोस्वामी ने कहा…

सत्य अहिंसा प्यार दया ममता
इस रस्ते बेचारे जाते हैं

सुभान अल्लाह...क्या ग़ज़ल कही है आपने...जिंदाबाद जनाब जिंदाबाद...बेहतरीन...वाह.
नीरज

~PakKaramu~ ने कहा…

Pak Karamu reading your blog

bhootnath ने कहा…

अरे ये यकायक भूतनाथ कहाँ आ गया भाई.....ये तो ग़ज़ल का समंदर लगता है....इसमें डूब कर हम मर जायेंगे.....ऐसा लगता है....!!...लाजवाब....यकीनन....अद्भुत....निस्संदेह....शानदार
जबरदस्त...और क्या कहूँ...सोचकर आता हूँ....!!