रविवार, 3 मई 2009

गजल- 58

एक एक जहन पर वही सवाल है
लहू लहू में आज फिर उबाल है

इमारतों में बसने वाले बस गए
मगर वो जिसके हाथ में कुदाल है ?

उजाले बाँटने की धुन तो आजकल
थकन से चूर चूर है, निढाल है

तरक्कियां तुम्हारे पास हैं तो हैं
हमारे पास भूख है, अकाल है

कलम का सौदा कीजिये, न चूकिए
सुना है कीमतों में फिर उछाल है

गरीब मिट गये तो ठीक होगा सब
अमीरी इस विचार पर निहाल है

तुम्हारी कोशिशें कुछ और थीं, मगर
हम आदमी हैं, यह भी इक कमाल है

7 टिप्‍पणियां:

neeta ने कहा…

imaraton men basne wale .......wah ,bahut khoob!

"लोकेन्द्र" ने कहा…

वाह........
खूब लिखा है आपने........
आज के समाज के परीद्रश्य का प्रस्तुतीकरण सराहनीय है...

नीरज गोस्वामी ने कहा…

आपने तो आज के हालत की बखिया उधेड़ दी....वाह...कमाल के शेर कहे हैं...सच्चाई से रूबरू करवाते हुए...दिली दाद कबूल फरमाएं...
नीरज

shama ने कहा…

बेहतरीन लिखा है..जब ये दिग्गज इतना कुछ कह गए...उनके आगे और काया कहूँ?
"आजतक यहाँ तक" में एक नयी मलिका शुरू की है...थोड़ी गडबडी हो गयी थी...आपके पहले मै आपको बताने चली आयी.
By mistake only the title had got published..someone jokingly remarked..." sab nekee kuemehee daal dee lagataa hai...!"Anyways...reading u is always an experience.

shama ने कहा…

गज़ब सशक्त है...मुझे बिना बातकी टिप्पणी करनी नहीं आती...इसमे मै केवल शुभकामनायें देके पलायन कर देती हूँ..
जी आपने ठीक कहा...वो मेरी आपबीती है...नाम तो बदलनेही पड़ते हैं..
आपकी टिप्पणियों को ehmiyat bhee देती हूँ...क्योंकि वो सही रहनुमाई भी करती हैं..lagtaa hai, shurukaa waky kat gaya hai..maafee chahtee hun..

Harkirat Haqeer ने कहा…

एक एक जहन पर वही सवाल है
लहू लहू में आज फिर उबाल है

बहुत खूब......!!

गौतम राजरिशी ने कहा…

बड़े दिनों बाद एक बेहद ही सशक्त ग़ज़ल पढ़ने को मिली है।
हर शेर लाजवाब है और करारी चोट करता हुआ..

विशेष कर दूसरे शेर का अंदाज़, वो मिस्रा-सानी का सवालिया स्टाइल...अहा!