शुक्रवार, 21 मई 2010

ग़ज़ल

हर घड़ी इस तरह मत सोचा करो
जिंदा रहना है तो समझौता करो


कुछ नहीं, इतना ही कहना था, हमें
आदमी की शक्ल में देखा करो


जात, मजहब, इल्म, सूरत, कुछ नहीं
सिर्फ़ पैसे देख कर रिश्ता करो


क्या कहा, लेता नहीं कोई सलाम
मशवरा मनो मेरा, सजदा करो


पास रक्खोगे तो जिल्लत पाओगे
यार इस ईमान का सौदा करो


एक आरक्षण के बल पर इन्कलाब
जागते में ख्वाब मत देखा करो


लोकसत्ता, लोकमत, जनभावना
फूल संग गुलदान भी बेचा करो

39 टिप्‍पणियां:

Apanatva ने कहा…

sabhee sher bahut achhe aur vazanee hai .

M VERMA ने कहा…

लोकसत्ता, लोकमत, जनभावना
फूल संग गुलदान भी बेचा करो
क्या बात है बेहतरीन
सभी शेर लाजवाब

Sulabh Jaiswal "सुलभ" ने कहा…

मुझे वही मिलता है जिसकी तलाश में मैं आपकी आप तक आता हूँ.

शुक्रिया !!

इस्मत ज़ैदी ने कहा…

पास रक्खोगे तो जिल्लत पाओगे
यार इस ईमान का सौदा करो


एक आरक्षण के बल पर इन्कलाब
जागते में ख्वाब मत देखा करो

बहुत ख़ूब!
अपनी पूरी आबो ताब के साथ ये आप का ही अंदाज़ हो सकता है ,
हमारे आस पास फैली अव्यवस्थाओं पर बेहद गहरा तंज़ जो अगर अव्यवस्था फैलाने वालों को समझ में आ जाए तो वक़्त ही बदल जाए शायद,
मुबारकबाद क़ुबूल करें ,न सिर्फ़ इसलिए कि ग़ज़ल अच्छी है बल्कि इस लिए भी कि इस तरह एक हस्सास इन्सान ही सोच सकता है .

संजय कुमार चौरसिया ने कहा…

bahut khoob likha aapne

http://sanjaykuamr.blogspot.com/

दिगंबर नासवा ने कहा…

सर्वत साहब ... मुबारक इस लाजवाब ग़ज़ल के ..
जात, मजहब, इल्म, सूरत, कुछ नहीं
सिर्फ़ पैसे देख कर रिश्ता करो
ज़माने के चलन को शेर में उतरा है आपने ... सच है आज पैसा ही धर्म और ईमान है ... ये ही भगवान है ...

पास रक्खोगे तो जिल्लत पाओगे
यार इस ईमान का सौदा करो
इस शेर में पूरी ग़ज़ल का सार नज़र आता है ... ये कम्बख़्त ईमान ही है जो हमेशा कचोटता रहता है .. सबसे पहले इसका सौदा होना ज़रूरी है ...

कतल है आपकी ग़ज़ल ...... लाजवाब ...

दिलीप ने कहा…

bahut sahi kya vyang aur kya chot ki hai

राज भाटिय़ा ने कहा…

पास रक्खोगे तो जिल्लत पाओगे
यार इस ईमान का सौदा करो

वाह वाह जी क्या बात है,आज का एक कडवा सच यह है

सूफ़ी आशीष/ ਸੂਫ਼ੀ ਆਸ਼ੀਸ਼ ने कहा…

Prabhu, AAP KAHAN aur main kahan?!?!
Main to yunhee aapbeetiyaan baanchta rehta hoon....
Lekin, ye kya apni is nayee gazal mein aap compromise karna sikha rahe hain!?!
Maine Hajmola kha liya hai!
Aaj ke chalan ko bakhoobi prakat kartee hai aapkee rachna!
Sat Sri Akal!
A Bachelor in Punjab!

डॉ. महफूज़ अली (Dr. Mahfooz Ali) ने कहा…

हमारी मुबारकबाद कुबूल करिए... इतनी सुंदर ग़ज़ल के लिए....

शाहिद मिर्ज़ा ''शाहिद'' ने कहा…

हर घड़ी इस तरह मत सोचा करो
जिंदा रहना है तो समझौता करो
व्यवस्थाओं पर तंज़ करते हर अश’आर में आपके रंग की छाप बिल्कुल साफ़ नज़र आती है.

Udan Tashtari ने कहा…

पास रक्खोगे तो जिल्लत पाओगे
यार इस ईमान का सौदा करो


-बहुत बेहतरीन गज़ल, आनन्द आ गया.

"अर्श" ने कहा…

कुछ नहीं, इतना ही कहना था, हमें
आदमी की शक्ल में देखा करो

इस एक शे;र ने पूरी ग़ज़ल की जमानत जप्त कर दी .... और कुछ नहीं कह पाउँगा बस सलाम करता चलूँ ...
और हाँ मतला भी कामयाब है ..
अर्श

Pawan Kumar ने कहा…

बहुत सही भाई जान.....
क्या मतला है
हर घड़ी इस तरह मत सोचा करो
जिंदा रहना है तो समझौता करो

यह तो खूब सच कहा आपने/.........
कुछ नहीं, इतना ही कहना था, हमें
आदमी की शक्ल में देखा करो
और
जात, मजहब, इल्म, सूरत, कुछ नहीं
सिर्फ़ पैसे देख कर रिश्ता करो
जिंदाबाद कहने को जी छह रहा है.....क़ुबूल करें...!

क्या कहा, लेता नहीं कोई सलाम
मशवरा मनो मेरा, सजदा करो
लोकसत्ता, लोकमत, जनभावना
फूल संग गुलदान भी बेचा करो
लूट लिया.......भाई जान....!

वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा…

जात, मजहब, इल्म, सूरत, कुछ नहीं
सिर्फ़ पैसे देख कर रिश्ता करो
खूब करारी चोट की है सर्वत साहब. बधाई.

विनोद कुमार पांडेय ने कहा…

sarwat ji.tarif kya karu aapke gazalon ki ab to shabd hi nahi bache kab se padhata aa raha hoon wahi taajaki aur wahi bhav..laazwaab gazal..badhai

अर्चना तिवारी ने कहा…

सर जी बहुत सुंदर ग़ज़ल पढ़ने को मिली है...शुक्रिया

स्वप्निल तिवारी ने कहा…

apne daur ki padtaal karti hui ghazal hai ....achhi hai ... :)

Indranil Bhattacharjee ........."सैल" ने कहा…

सर्वत जी,
बहुत बढ़िया ... एक से एक शेर हैं ...
खास कर ये बात बहुत पसंद आई -
पास रक्खोगे तो जिल्लत पाओगे
यार इस ईमान का सौदा करो

hem pandey ने कहा…

'पास रक्खोगे तो जिल्लत पाओगे
यार इस ईमान का सौदा करो'
- आज की सच्चाई यही है.

Himanshu Mohan ने कहा…

कई दिन नेट से दूर था, लौटते ही सीधा आपकी गज़ल पर पहुँचा, तारीफ़ करने के बजाय जाने क्या सोचने लगा हूँ अभी, और आपका मश्वरा सोचने के ख़िलाफ़ है…
दोबारा आऊँगा, मगर अभी तो सोच में ही पड़ गया हूँ।

श्रद्धा जैन ने कहा…

हर घड़ी इस तरह मत सोचा करो
जिंदा रहना है तो समझौता करो


ahaaaa kya seekh di hai

कुछ नहीं, इतना ही कहना था, हमें
आदमी की शक्ल में देखा करो


जात, मजहब, इल्म, सूरत, कुछ नहीं
सिर्फ़ पैसे देख कर रिश्ता करो

hmm yahi ho raha hai

क्या कहा, लेता नहीं कोई सलाम
मशवरा मनो मेरा, सजदा करो

waah waah


पास रक्खोगे तो जिल्लत पाओगे
यार इस ईमान का सौदा करो

teekha teer hai


एक आरक्षण के बल पर इन्कलाब
जागते में ख्वाब मत देखा करो

bahut karari gazal thi ......

aapki gazal par kuch kahun itni kaha meri bisaat....
bas seekh rahi hun padh rahi hun
aur padhna achcha lagta hai ......

गौतम राजऋषि ने कहा…

लीजिये "सर्वतमय" होने आया था, होकर जा रहा हूँ इन चार ग़ज़लों को पढ़कर। ये शेर लिये जा रहा हूँ..."पास रक्खोगे तो जिल्लत पाओगे
यार इस ईमान का सौदा करो"

Pushpendra Singh "Pushp" ने कहा…

bahut sundar gajal
sarvat sahab.......

daanish ने कहा…

"ज़िंदा रहना है , तो समझौता करो..."

ला-जवाब !!
ये एक अकेला मिसरा कह कर
जाने क्या कुछ नहीं कह दिया आपने हुज़ूर
वाह !!
और......
जात, मजहब, इल्म, सूरत, कुछ नहीं
सिर्फ़ पैसे देख कर रिश्ता करो
ऐसी कडवी सच्चाई को किस आसानी से कह डाला है ,,,तौबा
फिर उसके बाद ...
पास रक्खोगे, तो ज़िल्लत पाओगे
यार , इस ईमान का सौदा करो
..... .......
कुछ नहीं कह पाऊंगा !

नीरज गोस्वामी ने कहा…

सर्वत भाई जान कई बार आप ऐसी ग़ज़ल कह जाते हैं की तारीफ़ के लिए अलफ़ाज़ ढूंढें नहीं मिलते...दिन इसी ऊहापोह में निकल जाते हैं की क्या कहूँ क्या ना कहूँ? इस ग़ज़ल को पढ़ कर भी मैं ऐसी ही उलझन में पड़ गया हूँ..किस सादगी से तल्ख़ बातों को हम तक पहुंचाते हैं आप ...वाह वा करते ज़बान नहीं थकती...ऊपरवाला आपकी कलम पर हमेशा यूँ ही मेहर बान रहे...आमीन...
नीरज

PRAN SHARMA ने कहा…

YE SHER KHOOB HAI-
KUCHH NAHIN ITNAA HEE KAHNA THA MUJHE
AADMEE KEE SHAKL MEIN DEKHA
KARO.
KRIPYA EK BAAT PAR GAUR KIJIHYE
KI " SAZDA" SIRF KHUDA KE LIYE HEE
AATAA HAI.KISEE SHAKHS KO SAZDA
KARNA GALAT HO JAATAA HAI.

Unknown ने कहा…

क्या खूब गज़ल कही है । एक एक शेर इस व्यवस्था पर, इस समाज पर, आदमी पर यानि कि हम सब पर चोट करता हुआ । लाजवाब ।
अब आपकी टिप्पणी पर । आपको केरल यात्रा अच्छी लगी बहुत धन्यवाद ।
भव भय हरं.........................नाथम् ।
मुझे इतनी संस्कृत आती नही पर ताई और काका (मेरे आई बाबा) दोनो इसके जानकार थे । मेरे ख्याल से हरण संज्ञा हे और हर क्रिया तो यहां पर हरं ही ठीक होगा हम भाई बहन तो यही कहते आये हैं ।

Rajendra Swarnkar : राजेन्द्र स्वर्णकार ने कहा…

पूरी ग़ज़ल शानदार !
किसी एक शे'र को पसंद करना हो तो वह यह है

कुछ नहीं, इतना ही कहना था, हमें
आदमी की शक्ल में देखा करो

- राजेन्द्र स्वर्णकार
शस्वरं

Subhash Rai ने कहा…

Sarwat bhai, kal Shahid Nadeem aaye the. maine aap ka blog dikhaya, kuchh unhen padhkar sunaya bhi. ve bhi aap se agli mulakat ke muntjir hain. aap ne apne chehre par cream pawder laga diya. ab achchha lag raha hai. padha bhi ja raha hai.

Dr. Zakir Ali Rajnish ने कहा…

लीजिए, अब आजसे सोचना बंद।
वैसे गजल अच्छी कही है आपने बधाई।
--------
रूपसियों सजना संवरना छोड़ दो?
मंत्रो के द्वारा क्या-क्या चीज़ नहीं पैदा की जा सकती?

Rakesh Kaushik ने कहा…

ग़ज़ल के शेरों में छुपे भावों की जितनी सराहना करूं उतनी कम है - कितनों ने कितना कुछ कहा है - आपकी कलम को नमन

Unknown ने कहा…

हर घड़ी इस तरह मत सोचा करो
जिंदा रहना है तो समझौता करो

क्या बात है पूरी गज़ल ही हासिले गज़ल है

वक्त की समझो नजाकत तुम मियां
बात मत सच ऐसी भी लिक्खा करो

शे‘र बखिये ये उधे्ड़े हैं यहां
अब इन जख्मों की दवा लाया करो

विनोद कुमार पांडेय ने कहा…

धन्य हो जाता हूँ यहाँ आकर ..क्या खूब ग़ज़ल हर एक लाइन बेजोड़ ...इससे ज़्यादा क्या कहूँ...मेरे लिए तो खजाना हैं...बढ़िया ग़ज़ल के लिए धन्यवाद चाचा जी

रचना दीक्षित ने कहा…

हर घड़ी इस तरह मत सोचा करो
जिंदा रहना है तो समझौता करो


कुछ नहीं, इतना ही कहना था, हमें
आदमी की शक्ल में देखा करो

आज पहली बार आना हुआ पर आना सफल हुआ देर से आने का दुःख भी बेहद प्रभावशाली प्रस्तुति किस किस बात की तारीफ करूँ बस बेमिसाल..... लाजवाब.......

S.M.Masoom ने कहा…

क्या कहा, लेता नहीं कोई सलाम
मशवरा मनो मेरा, सजदा करो
बहुत गहरी बात कितनी आसानी से कह गए...माशाल्लाह

..मस्तो... ने कहा…

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कुछ नहीं !! इतना ही कहना था हमें
आदमी की शक्ल में देखा करो..
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achaa sher hai.. :) aur matla bhi achaa hua hai...

Unknown ने कहा…

खुबसूरत ग़ज़ल

Unknown ने कहा…

खुबसूरत ग़ज़ल