बयान देते हैं सब, कोई जी नहीं देता
कठिन समय पे कोई भीख भी नहीं देता
गरीब हो तो कहावत भी याद रखनी थी
बगैर तेल दिया रोशनी नहीं देता
चढाओ जितना भी जल, वो तो सिर्फ़ सूरज है
सुखा तो देता है लेकिन नमी नहीं देता
मैं दर्द लेके दुखी हूँ मगर पता है मुझे
मेरा ख़याल उन्हें भी खुशी नहीं देता
ये रिश्ते नाते भी लगते हैं उस महाजन से
जो सूद लेता है, खाता बही नहीं देता
लिखत पढ़त ही शरीफों में ले गयी सर्वत
मगर लहू मुझे संजीदगी नहीं देता
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सोमवार, 17 जनवरी 2011
गुरुवार, 17 दिसंबर 2009
ग़ज़ल- ek baar phir
रोशनी सब को दिखलाइये
ख़ुद पे भी गौर फरमाइए
आइना हूँ मैं दीवार पर
आइये, देखिये, जाइए
कौन आजाद है इस जगह
अपने शीशे बदलवाइये
लोग बेहद समझदार हैं
मौसमी गीत मत गाइए
रेत आंखों में भर जायेगी
इस हवा पर न इतराइये
लीजिये मुल्क जलने लगा
अब तो सिगरेट सुलगाइए
ख़ुद पे भी गौर फरमाइए
आइना हूँ मैं दीवार पर
आइये, देखिये, जाइए
कौन आजाद है इस जगह
अपने शीशे बदलवाइये
लोग बेहद समझदार हैं
मौसमी गीत मत गाइए
रेत आंखों में भर जायेगी
इस हवा पर न इतराइये
लीजिये मुल्क जलने लगा
अब तो सिगरेट सुलगाइए
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