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सोमवार, 23 अगस्त 2010

गज़ल

लुटेरा कौन है, पहचान कर खामोश रहती है
रिआया जानती है, जान कर खामोश रहती है.

बगावत और नारे सीखना मुमकिन नहीं इससे
ये बुजदिल कौम मुट्ठी तान कर खामोश रहती है.

कभी अखबार, काफी, चाय,सिग्रेट, पान, बहसों में
कोई आवाज़ उबल कर, ठान कर, खामोश रहती है.

गरीबी, भुखमरी, बेइज़्ज़्ती हमराह  हैं जिसके
वो बस्ती भी मुकद्दर मान कर खामोश रहती है.

दरख्तों पर असर क्या है तेरे होने न होने का
हवा खुद को जरा तूफ़ान कर, खामोश रहती है!

मंगलवार, 20 जुलाई 2010

गज़ल

बहुत दिनों के बाद आना मुमकिन हो सका है. कुछ काम की व्यस्तता, कुछ हालात, इन सभी ने कुछ ऐसा किया कि लगा जैसे नेट से मोह भंग हो गया हो. चाहते हुए भी कुछ नहीं हो सका. कुछ मित्रों से राय ली-क्या ब्लॉग बंद कर दूं....जवाब मिला, ऐसा होता रहता है. लगे रहो. फिर भी मन को चैन नहीं था. फिर सोचा यह कमेन्ट वगैरह का चक्कर खत्म कर दिया जाए. यह पॉइंट कुछ जचा, कमेन्ट का ऑप्शन खत्म कर दिया. जिन्हें मुझे पढना है, पढ़ लें. प्रशंसा लेकर करूंगा भी क्या. हाँ, जो दोष हों उनके लिए मेल बॉक्स तो है ही. 
फिलहाल, बिना कमेन्ट की इच्छा किए, गज़ल आपकी खिदमत में पेश है.

पता चलता नहीं दस्तूर क्या है 
यहाँ मंज़ूर, नामंजूर क्या है 

कभी खादी, कभी खाकी के चर्चे 
हमारे दौर में तैमूर क्या है  

गुलामी बन गयी है जिनकी आदत
उन्हें चित्तौड़ क्या, मैसूर क्या है

नहीं है जिसकी आँखों में उजाला
वही बतला रहा है नूर क्या है

बताओ रेत है, पत्थर कि शीशा
किया है तुम ने जिस को चूर, क्या है

यही दिल्ली, जिसे दिल कह रहे हो
अगर नजदीक है तो दूर क्या है

वतन सोने की चिड़िया था, ये सच है
मगर अब सोचिए मशहूर क्या है.

शनिवार, 5 जून 2010

सब कुछ है अपने देश में...!!!

किस्सा लखनऊ का है. जवाहर भवन सचिवालय स्थित प्रशिक्षण केंद्र में, ट्रेनिंग असिस्टेंट,राजेश शुक्लने ७ फरवरी, २००९ को आत्महत्या कर ली.पत्नी मिथिलेश और १६ वर्षीय बेटे पीयूष को पति की जगह न नौकरी मिली न फंड. फंड के लिए बेचारी दौडती रही, बाबुओं के आगे हाथ जोड़े, निदेशक से भी मिली लेकिन उसे कोरे आश्वासन ही मिलते रहे.

आर्थिक स्थिति बद से बदतर होती गयी. भुखमरी ने मिथिलेश को एनीमिया का रोगी बना दिया. ४ जून, २०१० को मिथिलेश ने अपने हक की राह देखते देखते आँखें बंद कर लीं. मौत की सूचना मिलने के बाद भी उस कार्यलय का कोई अदना सा कर्मचारी भी सहानुभूति प्रकट करने के लिए भी नहीं आया.

मैं गज़ल पोस्ट करने के इरादे से आया था, इसी दौरान इस खबर पर निगाह पड़ गयी. घंटों दिमाग उलझा रहा और अंत में यही निर्णय हुआ कि गज़ल जाए भाड़ में.

हम क्या हो गए हैं? क्या ये लक्षण इंसान के हैं. उत्तर प्रदेश की राजधानी के सचिवालय कर्मी के साथ जब ऐसा हो सकता है तो दूर-दराज़ के जिलों की स्थिति क्या होगी, अंदाज़ा लगाएं!

एक बात कहूं, पुलिस से नफरत तो पहले ही से दिल में बसी हुई है. अब सरकारी मुलाज़िमों के प्रति भी घृणा पैदा हो गयी. मैं बहुत कुछ लिखने की मनः स्थिति में नहीं हूँ. इस कारण, फैसला आप पर छोड़ता हूँ. मुझे आपकी सपाट बयानी या आम टिप्पणी नहीं चाहिए, हो सके तो समर्थन दें ताकि इस मामले को थोड़ा आगे बढ़ा सकूं. एक बात याद रखिएगा----

कुछ न कहने से भी मिट जाता है एजाज़-ए-सुखन

ज़ुल्म सहने से भी ज़ालिम की मदद होती है.

गुरुवार, 6 मई 2010

गज़ल

भला ये कोई ढंग है, मिला के हाथ देखिए 
तमीज़ तो यही है ना कि पहले ज़ात देखिए 

हुज़ूर आप फर्ज़ भी निभाइए मगर जरा 
ये थैलियाँ भी देखिए, तअल्लुकात देखिए 

कहीं भी सर झुका दिया, नया खुदा बना लिया 
गुलाम कौम को मिलेगी कब निजात, देखिए 

जब आँधियों का जोर थम गया तो पेड़ बोल उठा 
है कौन डाल-डाल कौन पात-पात देखिए 

जलाए आप ही ने सब चराग, ठीक है मगर 
उजाला-तीरगी हैं कैसे साथ-साथ, देखिए 

हर आदमी में ऐब ढूंढना कमाल तो नहीं 
कभी हुनर भी देखिए, कभी सिफात देखिए 
                                                                               
इसी तरह से मुल्क में रहेगा सर्वत अम्न  अब 
न कोई जुर्म ढूंढिए, न वारदात देखिए. 

शनिवार, 24 अप्रैल 2010

गज़ल

अमीर कहता है इक जलतरंग है दुनिया
गरीब कहते हैं क्यों हम पे तंग है दुनिया

घना अँधेरा, कोई दर न कोई रोशनदान 
हमारे वास्ते शायद सुरंग है दुनिया 

बस एक हम हैं जो तन्हाई के सहारे हैं 
तुम्हारा क्या है, तुम्हारे तो संग है दुनिया 

कदम कदम पे ही समझौते करने पड़ते हैं 
निजात किस को मिली है, दबंग है दुनिया 

वो कह रहे हैं कि दुनिया का मोह छोड़ो भी 
मैं कह रहा हूँ कि जीवन का अंग है दुनिया 

अजीब लोग हैं ख्वाहिश तो देखिए इनकी 
हैं पाँव कब्र में लेकिन उमंग है दुनिया 

अगर है सब्र तो नेमत लगेगी  दुनिया भी                                                         
नहीं है सब्र अगर फिर तो जंग है दुनिया 

इन्हें मिटाने की कोशिश में लोग हैं लेकिन 
गरीब आज भी जिंदा हैं, दंग है दुनिया