कहाँ आंखों में आंसू बोलते हैं
मैं मेहनतकश हूँ बाजू बोलते हैं
ज़बानें बंद हैं बस्ती में सबकी
छुरे, तलवार, चाकू बोलते हैं
मुहाफिज़ कुछ कहें, धोखा न खाना
इसी लहजे में डाकू बोलते हैं
कभी महलों की तूती बोलती थी
अभी महलों में उल्लू बोलते हैं
भला तोता और इंसानों की भाषा
मगर पिंजडे के मिट्ठू बोलते हैं
वहां भी पेट ही का मसअला है
जहाँ पैरों में घुँघरू बोलते हैं
जिधर घोडों ने चुप्पी साध ली है
वहीं भाड़े के टट्टू बोलते हैं
बस अपने मुल्क में मुस्लिम हैं सर्वत
अरब वाले तो हिंदू बोलते हैं
प्रोडक्ट के संभावित मूल्य
-
गत 20 वर्षों की आयुर्वेदिक साधना के दौरान मैने विभिन्न रोगों से बचाव और
उपचार के लिए सैकड़ों औषधियों का निर्माण किया है जिनमे रसायन भी हैँ। रसायनो
का निर्म...
3 दिन पहले
