बृहस्पतिवार, 4 मार्च 2010

होली............. गज़ल

सर्वत जी आपको  होली की हार्दिक शुभ कामनाये होली भारत का तुहार है और आप भी तो भारतीय हैं इस लिए .....:)

यह मेरे एक ब्लागर मित्र का मेल है जो मुझे होली की सुबह  प्राप्त हुआ. इस संदेश में शुभकामना देते हुए मित्र को जिस संशय का आभास हुआ, वह आपको भी नजर आ रहा होगा. मेरा तो मन जैसे हिल कर रह गया. जिस उत्साह से नेट पर आया था कि सबको होली की मंगलकामनाएँ भेजूंगा, वह उत्साह तो जैसे मर गया. क्या अब त्यौहार पर यह बताना पड़ेगा कि शुभकामना इस लिए दी जा रही है क्योंकि आप.....! 
मैं सोच में पड़ा रहा और होली कब गुजर गयी, यह पता भी नहीं चला. मैं क्षमाप्रार्थी हूँ आप सबसे कि मैं विश नहीं कर सका लेकिन इस मनोदशा से तो अब आप भी परिचित हो गए, आप ही सोचें, मुझे क्या लगा होगा.
बहुत से मित्रों की फरमाइश और दबाव मुझ लगातार बना हुआ है कि मैं गजलें पोस्ट करूं. कई लोगों का ख़याल है कि मैं किसी से नाराज़ हूँ, मैं कसम खाकर कहता हूँ कि मुझे सभी का प्यार ही मिला है, फिर नाराजगी, वो भी अपनों से, असम्भव. एक ताज़ा गजल के कुछ शेर पेश हैं: 


मैं भी इस दौर के बशर सा हूँ 
आँखें होते हुए भी अँधा हूँ 

मेरी हालत भी धान जैसी है 
पक रहा हूँ, नमी में डूबा हूँ 

जब मैं सहरा था, तब ही बेहतर था 
आज दरिया हूँ और प्यासा हूँ 

जबकि सुकरात भी नहीं हूँ मैं 
फिर भी हर रोज़ जहर पीता हूँ 

आप के भक्त हार जाएंगे 
आप भगवान हैं, मैं पैसा हूँ 

मेरे हमराह मेरा साया है 
और तुम कह रहे हो, तन्हा हूँ 

मैं ने सिर्फ एक सच कहा लेकिन 
यूं लगा जैसे इक तमाशा हूँ 

मैं न पंडित, न राजपूत, न शेख 
सिर्फ इन्सान हूँ मैं, सहमा हूँ                                       
यह 

31 टिप्पणियाँ:

सतीश सक्सेना ने कहा…

अशिक्षा और परिवार में मिले संस्कार दोषी हैं सर्वत भाई, जिससे आपका दिल दुखा ! शायद आपसे भी अधिक दिल आपकी धर्मपत्नी अलका मिश्रा का दुखा होगा, की उनके पति को किस कारण यह सजा दी जा रही है ! आप जैसे शानदार ह्रदय के मालिक, छोटी बातों को दिल से नहीं लगाते !
चलिए अब हंस दीजिये और इसी बात पर एक खूबसूरत ग़ज़ल की रचना करें , आपको दुखी देख ग़ज़ल रो उठेगी सर्वत जमाल ! और शायद आप खुद यह पसंद न करें ...आशा है मेरा अनुरोध मान लेंगे !
सादर !!

शाहिद मिर्ज़ा ''शाहिद'' ने कहा…

सर्वत साहब, आदाब
शुक्रिया, कि आपने अपने चाहने वालों के जज़्बात की
इतनी खूबसूरत ग़ज़ल पेश करते हुए कद्र की..

मेरी हालत भी धान जैसी है
पक रहा हूँ, नमी में डूबा हूँ

मैं ने सिर्फ एक सच कहा लेकिन
यूं लगा जैसे इक तमाशा हूँ ....

ये दो शेर बहुत उम्दा रहे...

अमिताभ मीत ने कहा…

बहुत उम्दा शेर भाई ... किस शेर का ज़िक्र करूं ... बेहतेरीन ग़ज़ल ............

कंचन सिंह चौहान ने कहा…

har sher umda

ham itne bant gaye hain,ki padha likha vyakti bhi is tarah ki baaten karta hai.... aise log sabhi ko sharminda karte hain...!

venus kesari ने कहा…

क्या कहूँ बोलती बंद है :)

गजल बहुत ख़ूबसूरत है

मैं भी इस दौर के बशर सा हूँ
आँखें होते हुए भी अँधा हूँ

मेरी हालत भी धान जैसी है
पक रहा हूँ, नमी में डूबा हूँ


क्या खूब बात कही है

वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा…

सर्वत साहब, सबसे पहले तो गज़ल पढवाने के लिये धन्यवाद और होली की शुभकामनायें.
सही कह रहे हैं सतीश जी, ये संस्कारों का ही दोष है.
मैं ने सिर्फ एक सच कहा लेकिन
यूं लगा जैसे इक तमाशा हूँ
बहुत लाजवाब शे’र. बधाई.

RaniVishal ने कहा…

Gazal behad lajawab hai....Padhane ke liye aapko bahut bahut dhanywad!

Aapki manodasha acche se samjh aati hai bahut badi jarurat hai aaj insaan ko apani soch ka dayara bada karane ki ...
http://kavyamanjusha.blogspot.com/

Suman ने कहा…

जब मैं सहरा था, तब ही बेहतर था
आज दरिया हूँ और प्यासा हूँ .nice

Udan Tashtari ने कहा…

वाह!! आप आये, अच्छा लगा.बेहतरीन गज़ल!!

सुलभ § सतरंगी ने कहा…

सर्वत साहब, आप मेरी पिछली टिप्पणीयों पर गौर करेंगे....

आपके चाहने वालों की कमी नहीं है. आप आये बहुत खुश हूँ. ग़ज़ल की तारिफ में कुछ भी कहना आज संभव नहीं है.

आपका
सुलभ

नीरज गोस्वामी ने कहा…

वाह सर्वत साहब वाह...देखिये कितना सच कहते हैं लोग की आप ग़ज़लें लिखा कीजिये...जो बात पोथियों पर पोथियाँ लिख कर भी नहीं समझाईं जा सकतीं ग़ज़ल का शेर कह देता है...सुभान अल्लाह...इस ग़ज़ल का एक एक शेर कलेजे से लगा लेने के काबिल है...मेरी दिली दाद कबूल फरमाएं...और ग़ज़लें कहते रहें...
नीरज

श्रद्धा जैन ने कहा…

Sarwat ji in baaton ko dil par mat liya kijiye

log kahte rahte hain ..... aur itna busy bhi na ho jaaye ki ham sab aapke darshan ko taras jaayen .......



मैं भी इस दौर के बशर सा हूँ
आँखें होते हुए भी अँधा हूँ
hmm aajkal sabki halat aisi hi hai


मेरी हालत भी धान जैसी है
पक रहा हूँ, नमी में डूबा हूँ


जब मैं सहरा था, तब ही बेहतर था
आज दरिया हूँ और प्यासा हूँ

kya baat kahi hai


जबकि सुकरात भी नहीं हूँ मैं
फिर भी हर रोज़ जहर पीता हूँ

hmmmm sach

आप के भक्त हार जाएंगे
आप भगवान हैं, मैं पैसा हूँ

waah waah


मेरे हमराह मेरा साया है
और तुम कह रहे हो, तन्हा हूँ


kamaal ka sher kaha hai sir ji

मैं ने सिर्फ एक सच कहा लेकिन
यूं लगा जैसे इक तमाशा हूँ
hmmmmm

मैं न पंडित, न राजपूत, न शेख
सिर्फ इन्सान हूँ मैं, सहमा हूँ

bahut khoobsurat gazal

har sher insaniyat batana
insaan ke dil ko padhta samjhta samjhaata

khushi hui ki aapne ham sabki aarzu ko dhyaan mein rakhte hue .... gazal post ki

likhte rahe

योगेश स्वप्न ने कहा…

sarwat ji , kuchh to log kahenge..............

ab jaane den.

gazal behad khubsurat hai. sabhi sher wah.........

इस्मत ज़ैदी ने कहा…

सर्वत साहब ,बहुत बहुत शुक्रिया ,welcome back,
आप आए और वो भी इस आब ओ ताब के साथ

जब मैं सहरा था, तब ही बेहतर था
आज दरिया हूँ और प्यासा हूँ


मैं ने सिर्फ एक सच कहा लेकिन
यूं लगा जैसे इक तमाशा हूँ

बहुत ख़ूब,

"अर्श" ने कहा…

मैं इस बात से इतफाक रखता हूँ और इस तरह की बातों का घोर निंदा करता हूँ कड़े शब्दों में ... संवेदनशील इंसान इन सुई से चुभोने वाली बातों पर ही रो पड़ता है ... बातें छोटी कही जा सकती है मगर दर्द बे-परवाह है... आपकी मनोदशा समझ सकता हूँ ... मगर हालात ये अब नहीं है के हम चुप रहे मगर आपने जो बातें अपनी ग़ज़ल से कही है वो ग्रन्थ लिख भी नहीं समझाई जा सकती हिया ... बस शे'र समझाने की बात है ...


अर्श

मिहिरभोज ने कहा…

ये आंखे किसकी है...लगता है इनको देख देख कर ही गजल लिख्ते हैं आप...खूबसूरत

Dr. Amar Jyoti ने कहा…

नासमझों की बातों को दिल पर न लें भाई। आप तो बस ऐसी ही बेहतरीन ग़ज़लें कहते रहें। नासमझों को वक़्त सिखा देगा कि सच क्या है।

अजित वडनेरकर ने कहा…

नादां हैं और अपना फ़र्ज़ पूरा कर रहे हैं
दिल को दुखाने का।

राज भाटिय़ा ने कहा…

सर्वत साहब ,मै दो चार दिनो के लिये दुर रहा इस कारण यह सब बाते मुझे पता नही चली, आज अचानक यहा देखा तो यह सब अच्छा नही लगा, यह बधाई देने वाला कोई भी हो लेकिन यह अपना नही हो सकता, ओर इस के संस्कार ही ऎसे मिले कि इसे समझ ही नही, चलिये आप ओर अलका जी के संग हम ने भी होली नही मनाई... ओर ऎसी छोटी मोटी बातो ओर बतमीजियो पर ध्यान मत दे, कुछ तुच्छ विचारो के लोगो को यह सब बकवास कर के मजा आता है, उन्हे खुश होने दे अल्लाह उन्हे अकल देगा, मस्त रहे ओर लिखते रहे

अविनाश वाचस्पति ने कहा…

कहने वालों को कहने दीजिए उनका मुंह नहीं पकड़ा जा सकता और न ही उनकी मन:स्थिति को बदला जा सकता है तो फिर आप अपनी मन:स्थिति को बदलकर क्‍यों दुखी हो रहे हैं। वो बात अलग है कि यही दुख आपकी कई सुंदर काव्‍य प्रस्‍तुतियों का सबब बनेगी। यह जगजाहिर है। आप पर असर हो रहा है तो वो सफल है और आप पर असर नहीं हो रहा है और हो भी रहा है और आप जाहिर नहीं कर रहे हैं तो वो असफल है। उसके लिए यही कड़वा फल है। इस फल को उसके लिए मीठा मत बनायें क्‍योंकि वो फल मीठा है ही नहीं।

दिगम्बर नासवा ने कहा…

Sarvat Saahab ..
Aisi baaton ko dil se nahi lagaana chaahiye ... isme unhi logon ki jeet hai jo aapse aisa karvaana chaahte hain ... aap kyon unke haath ka mohra banna chaahte hain ...

निर्मला कपिला ने कहा…

दो तीन दिन से दिल्ली गयी थी इस लिये आपके ब्लअग पर नही आ सकी। गज़ल पढने कल आती हूँ पढ ली एक बार मगर कमेन्ट करने और बार बार पढने कल आऊँगी। शुभकामनायें

अपूर्व ने कहा…

बात सिर्फ़ अशिक्षा और संस्कार की ही नही वरन्‌ हमारी सामाजिक बुनावट की भी है..जहाँ पर संशय, अविश्वास और अजनबियत को औपचारिकता की नकाब से ढका जाता है..
...और यह शायद हर उस इंसान के लिये सच है जो अपनी जाति-मजहब के पहचान से परे इंसान बने रहने की कवायद मे रहता है..
जबकि सुकरात भी नहीं हूँ मैं
फिर भी हर रोज़ जहर पीता हूँ

बेहतरीन गज़ल..हमेशा की तरह..

गौतम राजरिशी ने कहा…

गुरुवर को प्रणाम...और किसी का तो पता नहीं, किंतु इतना तो कह ही सकता हूं कि आप मुझसे नाराज हैं। हमने तो कान पकड़ कर उठक-बैठक भी कर ली....

और इतने दिनों बाद आये आप और वो भी खास सर्वत -शैली वाली ग़ज़ल लेकर, हम धन्य हुए। लाज्वाब ग़ज़ल...इस शेर के बिम्ब ने तो कमाल कर दिया है
"मेरी हालत भी धान जैसी है
पक रहा हूँ, नमी में डूबा हूँ "

....निगाहे-करम!!!!

अल्पना वर्मा ने कहा…

Ghazal मन को भेद गयी.
बेहद संवेदनशील अभिव्यक्ति.
--------------------
---[न जाने कब तक बंटते और बांटते रहेंगे एक दूसरे को इस तरह की तुच्छ विचारधारा वाले लोग.]--!

चिराग जैन CHIRAG JAIN ने कहा…

नमस्कार
गत वर्ष आप मेरे ब्लॉग पर आए थे तथा "महावीर भगवान" पर रचित कविता की अनुशंसा की थी।
आपके स्नेह और शुभकामनाओं से मैंने अपने ब्लॉग को वेबसाइट में रूपांतरित कर दिया है।
इस वेबसाइट पर आपको निरंतर अच्छी और सच्ची कविताएँ पढ़ने को मिलती रहेंगी।
आपके सुझाव तथा सहयोग अपेक्षित है।
कृपया एक बार विज़िट अवश्य करें

www.kavyanchal.com

शहरोज़ ने कहा…

आप बेहतर लिख रहे/रहीं हैं .आपकी हर पोस्ट यह निशानदेही करती है कि आप एक जागरूक और प्रतिबद्ध रचनाकार हैं जिसे रोज़ रोज़ क्षरित होती इंसानियत उद्वेलित कर देती है.वरना ब्लॉग-जगत में आज हर कहीं फ़ासीवाद परवरिश पाता दिखाई देता है.
हम साथी दिनों से ऐसे अग्रीग्रटर की तलाश में थे.जहां सिर्फ हमख्याल और हमज़बाँ लोग शामिल हों.तो आज यह मंच बन गया.इसका पता है http://hamzabaan.feedcluster.com/

सुलभ § सतरंगी ने कहा…

Aap mujhse bhi naaraj hain, ye baat samajh m enahi aa rahi. Mere email ka bhi jawaab nahi mila. khair, kam se kam aap blog par to lautiye.

:(

shama ने कहा…

मैं भी इस दौर के बशर सा हूँ
आँखें होते हुए भी अँधा हूँ

मेरी हालत भी धान जैसी है
पक रहा हूँ, नमी में डूबा हूँ

जब मैं सहरा था, तब ही बेहतर था
आज दरिया हूँ और प्यासा हूँ
Mai aksar nishabd ho jati hun...ye rachna mujhe meri auqat dikha rahi hai!Behad sundar rachna!

sanjeev ने कहा…

pranaam dada
lucknow main aapke darshan ke baad aur sneh se sikt hokar aaj net par baithaa hoon.
मेरी हालत भी धान जैसी है
पक रहा हूँ, नमी में डूबा हूँ
yahi haalat hai vaah! vaah!
naya email id taiyaar kiyaa hai--
sanjeevgautam2010@gmail.com
ab bataaye ki purane blog ko is kaise liya jaay.

श्याम सखा 'श्याम' ने कहा…

इतने दिन बाद आये
आते ही गज़ब ढाये
वही सर्वत कहलाए


आप के भक्त हार जाएंगे
आप भगवान हैं, मैं पैसा हूँ

मेरे हमराह मेरा साया है
और तुम कह रहे हो, तन्हा हूँ

मैं ने सिर्फ एक सच कहा लेकिन
यूं लगा जैसे इक तमाशा हूँ

मैं न पंडित, न राजपूत, न शेख
सिर्फ इन्सान हूँ मैं, सहमा हूँ